गफ़लत में पड़ गया हूँ , मंजिल मिली नहीं,
फिरता हूँ मारा -मारा , राहत कहीं नहीं।
दिखते सभी जगह अब दंगे फसाद ही,
चैन-ओ-सुकून जग में, यारों कहीं नहीं।
इन्सान बह गया है, हुस्नों की बाढ़ में,
देखो मगर करीब से, मुहब्बत कहीं नहीं।
मेरा भी प्यार अब तक, मेरा नसीब था,
खोजो वो खो गया है, यारों यहीं कहीं।
देखो ये ज़ख्म मेरे, नासूर बन गए,
मेरे बेदर्द दर्दों की, कहीं भी दवा नहीं।
ये बदकिस्मती हमारी, देखो ओ दुनिया वालों,
मेरे जनाज़े कब्र को मिलती जमीं नहीं।

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