यह ब्लॉग साहित्यिक होने के साथ ही, जीवन में सरसता, औत्सुक्य, जिजीविषा और नवीनता का संचार करने वाला है। जीवन के समस्त क्षेत्रों और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के नवीन और रचनात्मक अन्वेषणों को पूरी वैज्ञानिकता व विश्वसनीयता के साथ वैश्विक जगत को अवगत कराना इसका सबसे बड़ा उद्देश्य है।
Dr K K VERMA
- Dr. Krishna kanhaiya verma
- basti, uttar pradesh, India
- full name: Dr. Krishna kanhaiya verma qulifications: MA(hindi), B.ed., Phd(hindi), NET(june-2012, december-2012) publications- Do Gazlen(durvadal magazine)
गुरुवार, 7 जुलाई 2022
सोमवार, 9 मई 2022
तानाशाही
🌹🌹"तानाशाही" 🌹🌹
तानाशाही!!
दुर्दांतता, अपराध व
अमानवीयता का चरमोत्कर्ष है।
तानाशाही की स्थापना,
पूरी कायनात की
नपुंसकता की शर्त पर होती है।
लाखों लोगों, सैनिकों,
गोला बारूद के शेष रहते,
तानाशाही-प्रवृत्ति का विस्तार
खेद जनक है।
एक सुनियोजित और
सधी शहादत का विचार ही,
तानाशाही के खात्मे के लिए काफी है,
ऐसे नए भगत सिंह को
सौ अपराधों की भी माफी है।
तानाशाह,
अति आत्ममुग्ध,
वह व्यक्ति होता है,
जिसकी नियत गंदी,
और मन अर्ध विक्षिप्त होता है।
व्यभिचार और दुराचरण,
उसकी मूल प्रवृत्ति होती है,
एक तानाशाह,
इंसानियत का सबसे बड़ा दुश्मन है,
तानाशाह का जिंदा रहना,
तीर-कमान से लेकर
परमाणु बम तक की तौहीन है।
तानाशाह,
वहशी और दरिन्दा होता है।
अपने कुकृत्यों पर
वह कहां शर्मिंदा होता है ?
इंसानियत और धरती का
बोझ रहता है,
जब तक वह जिन्दा होता है।
तानाशाह,
धरती का सर्वाधिक डरने वाला,
कायर प्राणी होता है।
उसका साम्राज्य,
लोगों की बुजदिली पर,
निर्भर होता है,
वरना जिस मौत का खौफ दिखाकर,
वह लोगों को,
अपने आतंक में रखता है,
वही मौत उसकी भी,
सुनिश्चित रहती है।
हमारी-आपकी तरह ही,
तानाशाह के लिए भी,
बंदूक से निकली,
एक ही गोली काफी है,
यदि लोगों के अंदर,
इतना जज्बा बाकी है।
कि वह जीना चाहते हैं,
आजाद जिंदगी !
तो एक बार उन्हें,
इस आजादी के खतरे को,
उठाना ही होगा,
इसके इतर नहीं कोई रास्ता,
नहीं काम आने वाली,
कोई और बंदगी।
आज के परमाणु युग में
तानाशाही संपूर्ण धरती के लिए
अभिशाप है,
दुर्भाग्य से दुनिया में,
आज तानाशाही प्रवृत्ति,
विस्तार लेती जा रही,
इस पर ससमय नियंत्रण जरूरी है।
तानाशाह के हाथों में परमाणु हैं,
महाविनाश की बस एक क्लिक की दूरी है।
बढ़ती वैश्विक तानाशाही-प्रवृत्ति
महाशक्तियों की विफलता है,
शिक्षा, संस्कार और वैज्ञानिक प्रगति की,
यह सबसे बड़ी असफलता है।
तानाशाही अपने साथ,
झूठ,फरेब,आतंक,आत्ममुग्धता,
व्यभिचार-मिथ्याचार
और परस्वत्वापहरण लाती है।
तानाशाही अपने बाद,
बर्बादी, बदहाली, विध्वंस,
कराह, भूख, लूट, अराजकता,
नीरवता और मौत छोड़ जाती है।
अस्तु------
देश-दुनिया को हमें
तानाशाही से बचाना होगा।
तानाशाही प्रवृति के सत्ताधीशों को,
चुन-चुन कर
सत्ता से हटाना होगा।
आपका----
डॉ कृष्ण कन्हैया वर्मा
"वर्मा बस्तवी"
बुधवार, 4 मई 2022
"तानाशाही"
🌹🌹"तानाशाही" 🌹🌹
तानाशाही, दुर्दांतता, अपराध व
अमानवीयता का चरमोत्कर्ष है।
तानाशाही की स्थापना
पूरी कायनात की
नपुंसकता की शर्त पर होती है।
लाखों लोगों, सैनिकों,
गोला बारूद के शेष रहते,
तानाशाही-प्रवृति का विस्तार
खेद जनक है।
एक सुनियोजित और
सधी शहादत का विचार ही,
तानाशाही के खात्मे के लिए काफी है,
ऐसे नए भगत सिंह को
सौ अपराधों की भी माफी है।
तानाशाह,
अति आत्ममुग्ध,
वह व्यक्ति होता है,
जिसकी नियत गंदी,
और मन अर्ध विक्षिप्त होता है।
व्यभिचार और दुराचरण,
उसकी मूल प्रवृत्ति होती है,
एक तानाशाह,
इंसानियत का सबसे बड़ा दुश्मन है,
तानाशाह का जिंदा रहना,
तीर-कमान से लेकर
परमाणु बम तक की तौहीन है।
तानाशाह,
धरती का सर्वाधिक डरने वाला,
कायर प्राणी होता है।
उसका साम्राज्य,
लोगों की बुजदिली पर,
निर्भर होता है,
वरना जिस मौत का खौफ दिखाकर,
वह लोगों को,
अपने आतंक में रखता है,
वही मौत उसकी भी,
सुनिश्चित रहती है।
हमारी-आपकी तरह ही,
तानाशाह के लिए भी,
बंदूक से निकली,
एक ही गोली काफी है,
यदि लोगों के अंदर,
इतना जज्बा बाकी है।
कि वह जीना चाहते हैं,
आजाद जिंदगी !
तो एक बार उन्हें,
इस आजादी के खतरे को,
उठाना ही होगा,
इसके इतर नहीं कोई रास्ता,
नहीं काम आने वाली,
कोई और बंदगी।
आज के परमाणु युग में
तानाशाही संपूर्ण धरती के लिए
अभिशाप है,
दुर्भाग्य से दुनिया में,
आज तानाशाही प्रवृति,
विस्तार लेती जा रही,
इस पर ससमय नियंत्रण जरूरी है।
तानाशाह के हाथों में परमाणु हैं,
महाविनाश की बस एक क्लिक की दूरी है।
बढ़ती वैश्विक तानाशाही-प्रवृत्ति
महाशक्तियों की विफलता है,
शिक्षा, संस्कार और वैज्ञानिक प्रगति की,
यह सबसे बड़ी असफलता है।
तानाशाही अपने साथ,
झूठ,फरेब,आतंक,आत्ममुग्धता,
व्यभिचार-मिथ्याचार
और परस्वत्वापहरण लाती है।
तानाशाही अपने बाद,
बर्बादी, बदहाली, विध्वंस,
कराह, भूख, लूट, अराजकता,
नीरवता और मौत छोड़ जाती है।
अस्तु------
देश-दुनिया को हमें
तानाशाही से बचाना होगा।
तानाशाही प्रवृति के सत्ताधीशों को,
चुन-चुन कर
सत्ता से हटाना होगा।
आपका----
डॉ कृष्ण कन्हैया वर्मा
"वर्मा बस्तवी"
रविवार, 1 मई 2022
"बुलडोजर"
""बुलडोजर""
नकारात्मकता और बदनियती
देवत्व को भी,
पशुता में परिणत कर देती है।
रचनात्मकता कुंठित होकर,
विनाश और विध्वंस में,
तब्दील हो जाती है।
मृदु संभाषण भी
कलह का साधन बन जाता है, और बुलडोजर
सांप्रदायिकता का
संसाधन बन जाता है।
बुलडोजर!!
आज का यमराज है,
इसकी दहशत सब पर तारी है,
इससे बचने का प्रयास,
मिथ्या है,
आज हमारी
तो कल तुम्हारी बारी है।
यंत्रों से भला कौन पूछेगा?
तुम जिंदा या बेजान हो?
इतने निर्मम !
इतने निष्ठुर!!
तुम हिंदू या मुसलमान हो।
यह जिधर चल पड़ता है,
उधर वीरान हो जाता है।
सदाबहार गुलशन भी
पल भर में श्मशान हो जाता है। इसके गण हैं
चील कौवे और गिद्ध
अपने निर्दय संहार से,
यह करता है
विनाश को समृद्ध।
बुलडोजर
अब लोकतंत्र की
छाती पर भी चढ़ जाता है, संविधान की ऐसी-तैसी कर,
आगे बढ़ जाता है।
इसकी चोरों से बैर,
डकैतों से यारी है।
शासन का पालतू बड़ा,
दिन-रात भौंकना जारी है।
बुलडोजर ने
न्यायालय को भी
उसकी औकात दिखाई है,
यह देख विपक्ष कराह उठा, बुलडोजर भी भाजपाई है??
उन्माद,
लोकतंत्र और संविधान के विरुद्ध, अनपेक्षित गर्जन है,
जी हां,
बुलडोजर-संस्कृति,
तानाशाही का नया वर्जन है।
बुलडोजर
अपनी बेशुमार ताकत से,
विध्वंस का मर्म देखता है,
जी हां,
बुलडोजर आगे बढ़ने से पहले, जाति और धर्म देखता है।
शासन के संकेतों पर,
तत्क्षण आगे बढ़ जाता है।
धन्ना सेठों को छोड़,
गरीबों की छाती पर चढ़ जाता है।
दिल गरीब की आह से,
इसका कहां पसीजा है?
कहते हैं बुलडोजर
अंध भक्तों का जीजा है।
शासन,सत्ता के गुंडों से,
डर जाता है।
सरकारी अत्याचारों पर,
इसका जमीर मर जाता है।
दीन हीन जनता की,
इसको बिल्कुल भी परवाह नहीं,
बहरा है यह,
असहायों की भी सुनता तक है आह नहीं।
वो जो फुटपाथ पर,
टाट पट्टी से बनी छोटी दुकान थी, दरअसल वह दुकान ही नहीं,
एक परिवार के जीने का
सहारा थी,
जिसको तुमने
तहस-नहस कर दिया।
उसके बेतरतीब बिखरे
बिस्कुट और रेजगारी को,
एक-एक कर बीनता-बटोरता,
और
बीच-बीच में आंसुओं को,
बाहों में छुपाता,
सहमा नन्हा मासूम।
पास ही रोती-रोती
बेहोश हो जा रही
अपनी मां को
दौड़कर आगोश में लेता है,
दहाड़ मारकर रोता है,
आंसू पुकारते हैं,
मां---मां---मां!!!
मां के क्षणभर होश में आते ही,
वह पुनः दौड़ता है
पैसों और बिस्कुट ओ सहेजने।
एक तरफ जिंदगी
और दूसरी तरफ मां
के बीच भटकता बेसहारा,अबोध,
एक को सहेजने के प्रयास में, दूसरा हाथ से छूटा जाता है,
दोनों ही अनमोल है,
जिंदगी के लिए।
पास ही खड़े बुलडोजर
निर्दयी प्रशासन और
पुलिस की फौज को
मन में ही गरियाता है,
और बंदूकों पर निगाह जाते ही,
सन्न रह जाता है।
उसे नहीं ज्ञात कि
यह उसके मुसलमान
होने की सजा है,
पर इसमें उसकी क्या खता है ?
हिंदू-मुसलमान खेल का,
उसे अभी कहां संज्ञान है?
धर्म की राजनीति से वह
बिल्कुल अनजान है।
पूजा-पाठ रोजा नमाज को,
वह जीवन का
वसूल समझता है,
वह ना हिंदू ना मुसलमान
अभी तो वह केवल इंसान है।
किंतु इस भ्रष्ट व्यवस्था ने
आज न सिर्फ उसको झकझोरा है बल्कि भारत के भविष्य को झकझोरा है।
आज उसे मुसलमान होने की, पहली सीख दी गई है,
वह भी इसी देश का बच्चा है।
फिर उसे क्यों ?
अभिशप्त जीवन जीने की
भीख दी गई है ?
देश क्या जिंदा लाश में,
तब्दील हो गया है ?
किसी के मुंह से भी
इस मासूम के लिए निकली
आह तक नहीं,
बच्चे देश के भविष्य होते हैं
और देश के भविष्य के लिए
जरा भी परवाह तक नहीं।
किंतु मेरा जमीर जिंदा है,
मैं उस बच्चे की आवाज
बनूंगा, अवश्य।
वह मेरा भाई है,
जिसने आज बुलडोजर की
चोट खाई है।
मैं उसकी चोट देखकर
तिलमिला उठा हूं,
मैं बुलडोजर को नष्ट कर दूंगा,
और उस बुलडोजर-संस्कृति को
विनष्ट कर दूंगा।
जो इंसान-इंसान में भेद करता है,
धर्म और जातियों में
मतभेद करता है।
सांप्रदायिकता,
देश की अखंडता के लिए अभिशाप है,
और बुलडोजर-संस्कृति
इस अभिशाप का भी बाप है।
आप खड़े हों,
आपको खड़ा होते देख,
रुकेगा बुलडोजर ।
जगाएं समाज को,
आपके कदमों में,
झुकेगा बुलडोजर।।
बुलडोजर आरंभ में,
सत्ता की तानाशाही का साबूत है,
और
जी हां,
बुलडोजर आखिर में
तानाशाही का निश्चित ताबूत है।।
आपका :-
डाक्टर कृष्ण कन्हैया वर्मा
रविवार, 3 अप्रैल 2022
"युद्ध है कि रुकता नहीं" -- कविता।
आज की मेरी एक बहुत ही महत्वपूर्ण कविता
एक बार अवश्य पढ़ें 🙏🏼🙏🏼
शीर्षक -----
"युद्ध है कि रुकता नहीं"
सुबह से शाम तक,
खास से आम तक।
छोटे हों या हों बड़े,
चाहे बैठे या खड़े।
पूज्य याकि त्याज्य हों,
राजा या फिर राज्य हों।
धरती हो या आसमां,
जलती-बुझती या समां,
दादी मां की लोरियां,
आइंस्टीन की थ्योरियां।
न्यूटन के गति के नियम,
जज हों या कॉलेजियम।
सागर गह्वर या शिखर,
गांव , कस्बे या हों नगर।
गुरु हों या हों फिर शिष्य,
वर्तमान, भूत या हो भविष्य।
किसी के सामने आज,
इंसान है कि झुकता नहीं।
युद्ध है कि रुकता नहीं।।
नित्य युद्ध रत आदमी---
गैरों से कभी, कभी अपनों से,
कभी मुरझा चुके सपनों से।
कभी बाहर से, कभी अंदर से, कभी-कभी सांप-छछूंदर से।
मंहगाई डार्लिंग के बढ़ते प्यार से,
कभी मीडिया के बिके समाचार से।
कभी दरोगा, कभी सिपाही की गाली से,
घर देर से पहुंचने पर घरवाली से।
सुनता-सुनाता लड़ता है,
पर इससे कहां फर्क पड़ता है।
युद्ध इंशां पर तारी है,
नियति-नटी का नर्तन जारी है।
रिक्शे पर जाते बूढ़े की स्टिक से,
भौगोलिक सीमा पार करती लिपस्टिक से।
कभी रास्ता चलते पान की पीक से,
शहरों में टूटती जीवन की लीक से।
भ्रष्टाचार के अप्रत्याशित प्रसार से,
कचेहरी में झूठ के व्यापार से।
यह व्यापार है कि रुकता नहीं।
युद्ध है कि रुकता नहीं।।
आदमी आवाक है----
देखकर-----
माल्या-नीरव की लूट को, प्रधानमंत्री के बड़बोले झूठ को। राजनीति के गिरते स्तर को,
साधु,सन्यासी,मौलवी पादरी के, मखमली बिस्तर को।
देखता है-----
रुकता है, सोचता है, घिरता है,
सच और गलत के द्वंद्व में,
काटनी है
जीवन की मंजिल भी----
पुनः बढ़ते हैं कदम अंतर्द्वंद में। फिर भी उसे शिकायत है----
गांधी के देश में गोडसे की जयकार से,
सिंघ की मांद में कुत्तों की ललकार से।
अंधी अदालतों में निहत्थे सत्य की हार से,
फिल्मों से इतिहास गढ़ती मक्कारी सरकार से।
गंदी नियति वालों के स्वच्छता अभियान से,
अनपढ़ों द्वारा जारी शिक्षा पर व्याख्यान से।
अजीब विवेक शून्यता है, जागरूकता नहीं।
युद्ध है कि रुकता नहीं।।
कविता अभी और लम्बी है, आप सबके पसन्द पर पूरी कविता पोस्ट की जाएगी।