Dr K K VERMA

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basti, uttar pradesh, India
full name: Dr. Krishna kanhaiya verma qulifications: MA(hindi), B.ed., Phd(hindi), NET(june-2012, december-2012) publications- Do Gazlen(durvadal magazine)

बुधवार, 26 जून 2013

गाँव की बारात (हास्य कविता)

आज ही रोहित की शादी रचल बा,
बड़ा धूम गउवाँ मा अपने मचल बा।
लोग-बाग़ गउवाँ के घूमत-फिरत हउवैं
लरिका जवान सब बराती चलत हउवैं।
निबरू कहैं हम बराती चलब ना,
निरहू के मौसा औ सिरहू के नाना।
हेंतू, बहेंतू औ सेंतू के काका,
नेवल हम न जैहौं भयल हमरे पाका।
झगरू कहैं न मिलल हमके न्योता,
औ दूल्हा सजत बा बराती का देवता।
लोग सब सजि के बराती चलन लागे,
रघुवर के दादा सुनि खेतवा से भागे।
जाको जो भावै सवारी करन लागे,
चिथरू कहैं हम चलब आगे-आगे।
केऊ मोटरगाड़ी, केउ सइकिल पै बैठें,
केऊ हाथी-घोड़ा, केउ पैदल ही ऐठें।
खेदू कहैं हम वहीँ सबसे मिलबै,
झगरू कहैं हम सबहीं संग चलबै।
मंगरू कै है लंगड़ी घोड़ी सवारी,
गजब वेष-भूसा लगें जस मदारी।
सोनू औ मोनू चले बैठि गाड़ी,
गंगू मुस्कुरा के चढ़े बैलगाड़ी।
नाऊ औ पंडित हो संग  में चलत हउवैं,
पंडित के घोड़वे पे दोनों चढ़त हउवैं।
जुम्मन के छींक तबै आइ गइलै,
पंडित कहिन कि शगुन गड़बड़ भइलै।
भगेलू के मूर्छा है रहिया मा आई,
.अरे मोरे बप्पा, अरी मोरि माई।
नउवा कहै कि चलउ फुर्ती-फुर्ती,
औ रहिमन बैठि कै मलन लागे सुर्ती।
तब तक तौ मिरगी बहादुर के आई,
शगुन घुरहू सोचैं बराती न जाई।
दूल्हा कै डोला चलै धीरे-धीरे,
औ पंचम चले है नदी तीरे-तीरे।
केऊ भाँग, गाँजा, केउ चीलम चढ़ावें,
केऊ तन में फुर्ती शराबे से लावैं।
चले ढ़ोल, तबला, मजीरा बजावत,
केऊ गीत बदरी, केउ कजरी सुनावत।
औ गावत बजावत सब पहुंचे बराती,
सुनि अगवानी करने चले तब घराती।
केऊ जैरमी, केउ नमस्ते करत हैं,
केऊ पैलगी, केउ तो गोड्वो धरत हैं।
घड़ी देखैं सोमई अब बारह बजत बाटें,
सिगरे घराती में गुस्सा भरत बाटें।
गणिका की नाच तबै लाग होने,
उधर मूड़ फूटल लगे मंगरू रोने।
हल्ला-गुहार बहुत होन लागे,
औ सुनि के बराती-घराती सब जागे।
केऊ लाठी, डंडा, केउ गुम्मा उठावैं,
औ केहू के ऊपर केउ बरछा चलावैं।
मारत औ काटत, गिरावत चलत हैं,
औ धनवा कै करपी बिछावत चलत हैं।
न केउ काहू पूछें, न केउ काहू चीन्हैं,
भूले सब अपना-पराया न चीन्हैं।
जूझैं नशे मा बराती -घराती,
औ रोवै दुलहिया पकरि दोनों छाती।
एक गुम्मा पंडित के घोड़वा के लागल,
उखुडिया के खेतवा में तब घोड़वा भागल।
नाऊ औ पंडित गिरे गन्ने बीचे,
औ मंगरू दबाने गदहिया के नीचे।
तब नउवा कहै कि गज़ब होइ गै काका,
हम ताक़ी यहरियाँ, वहरियाँ तूँ ताका।
गिरले तब सोनू औ मोनू गड़हिया,
दिहेल फूँकि गंगू टुटहिया मड़इया।
लगी आग फ़ैलन तब गउवाँ मा सारे,
औ गउवाँ जरत बा बुझाओ रे सारे।
गउवाँ बचावन चले जब घराती,
मिला तब लें मौका घर भागे बराती।
केऊ पूरब-पश्चिम, केउ उत्तर को भागा,
औ कंधे पर दूल्हा, दुलहिया लै भागा।
केऊ ऊपर-नीचे, केउ दक्षिण को धावैं,
औ भूले केऊ आपन गउवाँ न पावैं।
तब सब कहैं अब बराती न जइबै,
बिना दाल-सब्ज़ी के रोटी हम खइबै।
रहिमन कहैं कि बचल जान भइया,
औ ऐसी बराती न जाबै रे मइया।
सोचैं सबै कि ग़जब रात रहली,
औ गाँव की बारात रहलि मोरी पहली।

मंगलवार, 25 जून 2013

मधुकरानिलकली

मधुकरानिलकली

गहन, नीरव वन बीच
जहाँ
अतिशीतलता, अनिल बिहीन।
नूतन किसलय मध्य
एक नवोढ़ा कली
यौवन-मद-मस्त
कर रही श्रृंगार,
डाले कंठ
सुमनों का हार।
छा गए अचानक
नभ मेघों के पुंज,
और सुहाया मौसम
निकला एक मधुकर कुंज।
वह गा रहा था
कोई गाना
जो था
बिरह का,
फिर वह
लगाता चक्कर पहुंचा
जहाँ बैठे थे हम,
फिर जाने क्यूँ
लगा सिर के
दो फेरे
बढ़ा कुछ आगे,
अनजाने ही में
जा पहुंचा फिर
उसी कली के आगे।
मिल गए नेत्र
दोनों के
अचानक कली
लज्जित सी मुस्कुरायी
फिर हँस पड़े दोनों
फिर निष्ठुर मधुप
जा समीप
चूम लिए
सुन्दर कपोल लाल
हो गयी कली क्रुद्ध
उसके इस
बेशर्मी कारनामे से
देख कली को नाराज़
मधुप गया ठिठक कुछ।
फिर कली ने देख मधुकर को
भयभीत
कर ओट
घूंघट-पत्तों के
लगी खिलखिलाकर हंसने,
पुनः हँसते देख कली को
उसके काननचारी दृगों को
दुष्ट कामान्ध मधुप
ना सका संभाल
खुद को।
जा समीप कली के
लगा गुनगुनाने
और जानकर उसकी गुप्त अनुमति
देख उसके
कामोत्तेजना से गुदगुदाते
उरोजों को
असहाय-सा हो
गिर पड़ा उसके आँचल में।
तब कली ने
दे दी अनुमति उसे प्रत्यक्ष
केलि करने की
फिर दोनों लिपट कर आपस में
लगे काम-क्रीड़ा करने
इस बीच
मेघ-झरोखे से प्रभाकर
देखकर यह
युगल प्रेम
गया छिप पुनः।
खिल गयी कली फिर
प्रिय मधुप के स्पर्श से
हो गए शिथिल दोनों के तन
आपसी संस्पर्श से
तभी अचानक
आ पहुंचा वहां
मंथर-मंथर अनिल।
देख दोनों की करामात
जल उठा वह क्रोध से
पूंछा कली से
है कौन यह?
जो मेरी जगह तुमसे.......?
मेरा प्रिय।
कली ने उत्तर दिया।
झुंझलाकर बोला अनिल
मैं हूँ तेरा प्रिय
ना कि मधुप
सामान्य जनों को
कौन कहे
कहते हैं ऐसा ही कवि भी।
सुन कड़ककर  बोला मधुप
अनिल तू है
नादान अभी,
यदि कविजन ऐसा कहते हैं
तो कहते हैं गलत सभी।
इसका रस मैं लेता
अंकों में इसके
मैं सोता।
मैं हूँ इसका
सच्चा प्रिय
हमें देख फिर क्यों तू जलता
अपमानित अनिल
लगा अंधड़-सा चलने,
निज प्रिय मधुकर के
रक्षार्थ,
कली ने अपने सुन्दर पत्रांकों में
उसे
कर लिया बंद।
थक गया अनिल/हो गया शांत
देखा दोनों फिर स्वच्छंद
खुल गया
उसका पोल
हंस पड़े हम
कहने लगा अनिल
कर दो क्षमा
प्रिय मधुप/मधुकर
प्रिया सुमन/कली।

हाइकू कविता

1. त्रेता के सुषेन,
    कलयुग के
    झोला छाप।

2. आज गाँधी भी बहुत हैं,
    स्वतंत्रता की लड़ाइयाँ भी बहुत हैं
    पर उनमें अजेय अहिंसा नहीं है।

3. अब भगवान् को जब
    अपने भक्तों की परीक्षा लेनी होगी
    तो वह नक़ल होने देगा या अध्यादेश लागू करेगा।

4. यदि आपकी कोई जाति  नहीं,
    तो देश की राजनीति में
    आपका कोई भाग नहीं।

5. दिनकर की दुनिया
    विचित्र नवीन
    हमारी अर्थहीन, उदासीन, दिशाहीन।

6. दुःख की जड़ों को पहले संयोंजते हैं
    फिर खोजते उनमें कभी
    फल-फूल-सुख की पंक्तियाँ।

7. प्रेम की फुलवारी में
    ऐसा हो माली
    जो ना तोड़े फूल, न काटे डाली।

8. पहले जब दुःखी होता था
    तब ईश्वर का नाम लेता था
    अब जब ईश्वर का नाम लेता हूँ, दुःखी हो जाता हूँ।

9. परमाणु अस्त्रों का बढ़ता प्रसार
    तृतीय विश्वयुद्ध का
    सुदृढ़ आधार।

10. आज के राजनेता
      भ्रष्टाचार के
      प्रणेता।

दुनिया के सवालात का यारों जवाब हूँ......

दुनिया के सवालात का यारों जवाब हूँ,
अब तक के लेन-देन का सारा हिसाब हूँ।

पढ़ते जिसे छुपा के मैं वो किताब हूँ,
हसीनों का नहीं यारों खुदा का ख्वाब हूँ।

सारे जहाँ से कह दो मेरा ख्याल वो रक्खें,
नहीं दुनिया को मिटा दूंगा में वो जनाब हूँ।

चलना है सबको मेरे नक़्श-ए -कदम पे,
डरना नहीं मैं सबसे हाज़िर जवाब हूँ।

मुझसे जुदा होकर कहीं ऐतबार मत करना,
पीता जो नहीं बचता मैं वो शराब हूँ।

कुछ तो मेरी मजबूरियां कुछ मेरे वसूल,
इसीलिए दुनिया को मैं दिखता  ख़राब हूँ।

गफ़लत में पड़ गया हूँ , मंजिल मिली नहीं ....

गफ़लत में पड़ गया हूँ , मंजिल मिली नहीं,
 फिरता हूँ मारा -मारा , राहत कहीं नहीं।

दिखते सभी जगह अब दंगे फसाद ही,
चैन-ओ-सुकून जग में, यारों कहीं नहीं।

इन्सान बह गया है, हुस्नों की बाढ़ में,
देखो मगर करीब से, मुहब्बत कहीं नहीं।

मेरा भी प्यार अब तक, मेरा नसीब था,
खोजो वो खो गया है, यारों यहीं कहीं।

देखो ये ज़ख्म मेरे, नासूर बन गए,
मेरे बेदर्द दर्दों की, कहीं भी दवा नहीं।

ये बदकिस्मती हमारी, देखो ओ दुनिया वालों,
मेरे जनाज़े कब्र को मिलती जमीं नहीं।