आज की मेरी एक बहुत ही महत्वपूर्ण कविता
एक बार अवश्य पढ़ें 🙏🏼🙏🏼
शीर्षक -----
"युद्ध है कि रुकता नहीं"
सुबह से शाम तक,
खास से आम तक।
छोटे हों या हों बड़े,
चाहे बैठे या खड़े।
पूज्य याकि त्याज्य हों,
राजा या फिर राज्य हों।
धरती हो या आसमां,
जलती-बुझती या समां,
दादी मां की लोरियां,
आइंस्टीन की थ्योरियां।
न्यूटन के गति के नियम,
जज हों या कॉलेजियम।
सागर गह्वर या शिखर,
गांव , कस्बे या हों नगर।
गुरु हों या हों फिर शिष्य,
वर्तमान, भूत या हो भविष्य।
किसी के सामने आज,
इंसान है कि झुकता नहीं।
युद्ध है कि रुकता नहीं।।
नित्य युद्ध रत आदमी---
गैरों से कभी, कभी अपनों से,
कभी मुरझा चुके सपनों से।
कभी बाहर से, कभी अंदर से, कभी-कभी सांप-छछूंदर से।
मंहगाई डार्लिंग के बढ़ते प्यार से,
कभी मीडिया के बिके समाचार से।
कभी दरोगा, कभी सिपाही की गाली से,
घर देर से पहुंचने पर घरवाली से।
सुनता-सुनाता लड़ता है,
पर इससे कहां फर्क पड़ता है।
युद्ध इंशां पर तारी है,
नियति-नटी का नर्तन जारी है।
रिक्शे पर जाते बूढ़े की स्टिक से,
भौगोलिक सीमा पार करती लिपस्टिक से।
कभी रास्ता चलते पान की पीक से,
शहरों में टूटती जीवन की लीक से।
भ्रष्टाचार के अप्रत्याशित प्रसार से,
कचेहरी में झूठ के व्यापार से।
यह व्यापार है कि रुकता नहीं।
युद्ध है कि रुकता नहीं।।
आदमी आवाक है----
देखकर-----
माल्या-नीरव की लूट को, प्रधानमंत्री के बड़बोले झूठ को। राजनीति के गिरते स्तर को,
साधु,सन्यासी,मौलवी पादरी के, मखमली बिस्तर को।
देखता है-----
रुकता है, सोचता है, घिरता है,
सच और गलत के द्वंद्व में,
काटनी है
जीवन की मंजिल भी----
पुनः बढ़ते हैं कदम अंतर्द्वंद में। फिर भी उसे शिकायत है----
गांधी के देश में गोडसे की जयकार से,
सिंघ की मांद में कुत्तों की ललकार से।
अंधी अदालतों में निहत्थे सत्य की हार से,
फिल्मों से इतिहास गढ़ती मक्कारी सरकार से।
गंदी नियति वालों के स्वच्छता अभियान से,
अनपढ़ों द्वारा जारी शिक्षा पर व्याख्यान से।
अजीब विवेक शून्यता है, जागरूकता नहीं।
युद्ध है कि रुकता नहीं।।
कविता अभी और लम्बी है, आप सबके पसन्द पर पूरी कविता पोस्ट की जाएगी।
