🌹🌹जातीयता का दंश-2🌹🌹
पुरानी पेंशन की लड़ाई में
शामिल होकर भी
वह
पुरानी पेंशन के विरोधियों को
वोट करता है,
दिखता साथ यद्यपि
वह
समता के आग्रहियों के,
फिर भी लगातार
सभी तरह की समानताओं पर
चोट करता है।
लड़ाई में दिखता है शामिल
वह
न्याय की स्थापना की ,
जबकि
न्यायिक नहीं उसका चरित्र है,
उसकी पोथियां उदघोषक हैं
उसकी कारस्तानियों की
फिर भी बनता
वह
सच्चरित्र है।
मजमा देखने पर
समाजवाद की भी जुगाली करता है,
वैसे तो वह
लोकतंत्र की भी गलौज-गाली करता है।
नेतृत्व का लाभ मिलने पर
वह
बेरोजगारों की भी बात करता है
जबकि शासन की बैठक में
निजीकरण की हामी भरता है।
पीढ़ियों से
खेती किसानी से अनभिज्ञ
मौका परस्ती में
किसान आंदोलन में भी चला जाता है,
अपने जातीय सम्मेलनों में
खालिस्तानी,नक्सली,बोलकर
उसके द्वारा
किसानों को हमेशा छला जाता है।
कविता में
"वह"
कोई व्यक्ति नहीं
एक जाति वर्ग है साहब
जिसे दूसरी जातियों के
अस्तित्व से नफरत है,
असमानता, अन्याय, अपराध
उसकी जन्मजात हसरत है।
यही जाति वर्ग
समाज की
बहुसंख्यक समस्याओं की जड़ है,
वर्तमान में
देश की सबसे बड़ी समस्या
जातीय अकड़ है।
Dr K K VERMA (वर्मा बस्तवी)

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