अतिशय पूंजीवादी संस्कृति से उपजी विवेकशून्यता ने वैश्विक जगत को दिशाहीनता का शिकार बना दिया है। आर्थिक लाभ के लिए आज कोई किसी भी हद तक जाने को तत्पर है। ऐसे में नैतिकता, ईमानदारी,संयम,मर्यादा और इंसानियत की बातें अब इतिहास बन चुकी हैं। आज जिसके पास धन है वही सर्वगुण संपन्न समझा जाने लगा है चाहे उसका अतीत कितना भी दागदार और काला न रहा हो। तो यह विवेकशून्यता नहीं तो और क्या है ? आर्थिक विकास के चक्कर में मानवीय मूल्यों का त्याग हमकों पशुओं से भी बदतर हालात में पहुंचा देगा। मनुष्य उच्च क्षमता युक्त मस्तिष्क और अपनी व्यापक संवेदना-शक्ति के आधार पर ही धरती के अन्य जीवों से श्रेष्ठ बना था, किन्तु दुर्भाग्य वश उसके उच्च क्षमतावान मस्तिष्क में विवेक के स्थान पर अविवेक हावी होता जा रहा है, रही बात संवेदना की तो इस स्तर पर भी वह काफी पीछे जा चुका है। आज के समाज की असंवेदनशीलता किसी से छिपी नहीं है।
ऐसे संक्रमण के दौर में वैश्विक बुद्धिजीवियों का प्रथम कर्तव्य बन जाता है कि वो आगे आकर समय-समाज को सही दिशा दें। क्योंकि दिनकर जी ने हम सबको बहुत पहले से ही आगाह कर रखा है------------
"जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।"
दुनिया में चतुर्दिक त्राहिमाम मची हुई है, कहीं पर जातीयता का नंगा नाच हो रहा है तो कहीं नस्लीय भेदभाव को लेकर नरसंहार हो रहा है। कहीं पर धार्मिक अन्धभक्ति मानवता के लिए अभिशाप बनी हुई है तो कहीं पर सत्ता-लोलुपता का ताण्डव नर्तन हो रहा है। कहीं भी सुकून नहीं, कहीं भी शान्ति नहीं।
माबलिंचिंग अपराध की दुनिया की सबसे घिनौनी हरकतों में से एक है, यह कुछ देशों के आतंकवादी व अतिवादी संगठनों का नया आपराधिक हथियार है। इसका चोला ओढ़कर कुछ लोग और संगठन अपने कृत अपराधों से खुद का बचाव करते हैं। इस पर ससमय ध्यान दिया जाना अति आवश्यक है।
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