Dr K K VERMA

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full name: Dr. Krishna kanhaiya verma qulifications: MA(hindi), B.ed., Phd(hindi), NET(june-2012, december-2012) publications- Do Gazlen(durvadal magazine)

रविवार, 1 मई 2022

"बुलडोजर"

 ""बुलडोजर""


नकारात्मकता और बदनियती

देवत्व को भी,

पशुता में परिणत कर देती है।

रचनात्मकता कुंठित होकर,

विनाश और विध्वंस में,

तब्दील हो जाती है।

मृदु संभाषण भी

कलह का साधन बन जाता है, और बुलडोजर

सांप्रदायिकता का 

संसाधन बन जाता है।


बुलडोजर!!

आज का यमराज है,

इसकी दहशत सब पर तारी है,

इससे बचने का प्रयास,

मिथ्या है,

आज हमारी

तो कल तुम्हारी बारी है।


यंत्रों से भला कौन पूछेगा?

तुम जिंदा या बेजान हो? 

इतने निर्मम !

इतने निष्ठुर!!

तुम हिंदू या मुसलमान हो।


यह जिधर चल पड़ता है,

उधर वीरान हो जाता है।

सदाबहार गुलशन भी 

पल भर में श्मशान हो जाता है। इसके गण हैं

चील कौवे और गिद्ध

अपने निर्दय संहार से,

यह करता है

विनाश को समृद्ध। 


बुलडोजर

अब लोकतंत्र की

छाती पर भी चढ़ जाता है, संविधान की ऐसी-तैसी कर,

आगे बढ़ जाता है।


इसकी चोरों से बैर, 

डकैतों से यारी है।

शासन का पालतू बड़ा,

दिन-रात भौंकना जारी है। 


बुलडोजर ने

न्यायालय को भी 

उसकी औकात दिखाई है,

यह देख विपक्ष कराह उठा, बुलडोजर भी भाजपाई है??


उन्माद,

लोकतंत्र और संविधान के विरुद्ध, अनपेक्षित गर्जन है,

जी हां,

बुलडोजर-संस्कृति,

तानाशाही का नया वर्जन है।


बुलडोजर

अपनी बेशुमार ताकत से, 

विध्वंस का मर्म देखता है,

जी हां,

बुलडोजर आगे बढ़ने से पहले, जाति और धर्म देखता है। 


शासन के संकेतों पर,

तत्क्षण आगे बढ़ जाता है। 

धन्ना सेठों को छोड़, 

गरीबों की छाती पर चढ़ जाता है।


दिल गरीब की आह से,

इसका कहां पसीजा है? 

कहते हैं बुलडोजर

अंध भक्तों का जीजा है। 


शासन,सत्ता के गुंडों से,

डर जाता है।

सरकारी अत्याचारों पर,

इसका जमीर मर जाता है। 

दीन हीन जनता की,

इसको बिल्कुल भी परवाह नहीं,

बहरा है यह, 

असहायों की भी सुनता तक है आह नहीं।


वो जो फुटपाथ पर,

टाट पट्टी से बनी छोटी दुकान थी, दरअसल वह दुकान ही नहीं, 

एक परिवार के जीने का

सहारा थी,

जिसको तुमने

तहस-नहस कर दिया।

उसके बेतरतीब बिखरे

बिस्कुट और रेजगारी को,

एक-एक कर बीनता-बटोरता,

और

बीच-बीच में आंसुओं को,

बाहों में छुपाता,

सहमा नन्हा मासूम।

पास ही रोती-रोती 

बेहोश हो जा रही

अपनी मां को 

दौड़कर आगोश में लेता है,

दहाड़ मारकर रोता है,

आंसू पुकारते हैं,

मां---मां---मां!!!

मां के क्षणभर होश में आते ही,

वह पुनः दौड़ता है 

पैसों और बिस्कुट ओ सहेजने।

एक तरफ जिंदगी 

और दूसरी तरफ मां

के बीच भटकता बेसहारा,अबोध,

एक को सहेजने के प्रयास में, दूसरा हाथ से छूटा जाता है,

दोनों ही अनमोल है,

जिंदगी के लिए।


पास ही खड़े बुलडोजर 

निर्दयी प्रशासन और 

पुलिस की फौज को 

मन में ही गरियाता है,

और बंदूकों पर निगाह जाते ही,

सन्न रह जाता है।

उसे नहीं ज्ञात कि 

यह उसके मुसलमान

होने की सजा है,

पर इसमें उसकी क्या खता है ?

हिंदू-मुसलमान खेल का,

उसे अभी कहां संज्ञान है?

धर्म की राजनीति से वह 

बिल्कुल अनजान है।

पूजा-पाठ रोजा नमाज को,

वह जीवन का

वसूल समझता है,

वह ना हिंदू ना मुसलमान

अभी तो वह केवल इंसान है।


किंतु इस भ्रष्ट व्यवस्था ने

आज न सिर्फ उसको झकझोरा है बल्कि भारत के भविष्य को झकझोरा है।

आज उसे मुसलमान होने की, पहली सीख दी गई है,

वह भी इसी देश का बच्चा है।

फिर उसे क्यों ?

अभिशप्त जीवन जीने की

भीख दी गई है ?


देश क्या जिंदा लाश में,

तब्दील हो गया है ?

किसी के मुंह से भी

इस मासूम के लिए निकली

आह तक नहीं,

बच्चे देश के भविष्य होते हैं 

और देश के भविष्य के लिए 

जरा भी परवाह तक नहीं।


किंतु मेरा जमीर जिंदा है,

मैं उस बच्चे की आवाज

बनूंगा, अवश्य। 

वह मेरा भाई है,

जिसने आज बुलडोजर की 

चोट खाई है।

मैं उसकी चोट देखकर

तिलमिला उठा हूं,

मैं बुलडोजर को नष्ट कर दूंगा,

और उस बुलडोजर-संस्कृति को 

विनष्ट कर दूंगा।

जो इंसान-इंसान में भेद करता है,

धर्म और जातियों में

मतभेद करता है।


सांप्रदायिकता,

देश की अखंडता के लिए अभिशाप है,

और बुलडोजर-संस्कृति

इस अभिशाप का भी बाप है।


आप खड़े हों,

आपको खड़ा होते देख,

रुकेगा बुलडोजर ।

जगाएं समाज को,

आपके कदमों में,

झुकेगा बुलडोजर।।


बुलडोजर आरंभ में,

सत्ता की तानाशाही का साबूत है,

और

जी हां,

बुलडोजर आखिर में

तानाशाही का निश्चित ताबूत है।।


आपका :-

डाक्टर कृष्ण कन्हैया वर्मा

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